अथ्याय 8 किसान जमींदार और राज्य
1. ‘खुदकाश्त’ व ‘पाहीकाश्त’ में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
खुदकाश्त: ये वे किसान थे जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी जमीन थी।
पाहीकाश्त: वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँव से ठेके पर खेती करने आते थे। लोग अपनी मर्जी से भी पाहीकाश्त बनते थे; जैसे अगर दूसरे गाँव में बेहतर अवसर मिलते थे। कभी-कभी मजबूरी में भी, जैसे अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी के कारण।
2. जिन इलाकों में प्रतिवर्ष 40 इंच या उससे ज्यादा बारिश होती थी, वहाँ किस चीज की खेती होती थी तथा कम बारिश वाले इलाकों में किसकी खेती होती थी?
उत्तर:
(i) जमीन की बहुतायत, मजदूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता के कारण कृषि का लगातार विस्तार हुआ। खेती का मुख्य उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार आदि फसलें अधिक उगाई जाती थीं।
(ii) जिन इलाकों में प्रतिवर्ष 40 इंच से ज्यादा बारिश होती थी, वहाँ मुख्यतः चावल की खेती होती थी। कम और कमतर बारिश वाले इलाकों में क्रमशः गेहूँ तथा ज्वार-बाजरा की खेती अधिक प्रचलित थी।
3. सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचीं। उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
17वीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नई फसलें भारतीय उपमहाद्वीप में पहुँचीं।
मक्का अमेरिका और यूरोप के रास्ते भारत आया।
टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्जियाँ नई दुनिया से लाई गईं।
अनानास और पपीता जैसे फल भी वहाँ से आए।
4. ‘जमा’ तथा ‘हासिल’ क्या थे?
उत्तर:
(i) लोगों पर कर का बोझ निर्धारित करने से पहले मुगल राज्य जमीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में जानकारी एकत्र करता था। भू-राजस्व के इंतजाम में दो चरण थे—
कर निर्धारण
वास्तविक वसूली
(ii) जमा निर्धारित रकम थी और हासिल वास्तव में वसूली गई रकम थी।
5, उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज अफसरों द्वारा भारतीय गाँवों को एक छोटे ‘गणराज्य’ के रूप में देखा गया। यह कथन कहाँ तक सत्य है?
उत्तर:
(i) उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज अफसरों ने भारतीय गाँवों को एक ऐसे छोटे गणराज्य के रूप में देखा, जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे।
(ii) लेकिन ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक बराबरी थी। संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी तथा जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर समाज में गहरी विषमताएँ थीं। कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फैसले लेते थे और कमजोर वर्गों का शोषण करते थे। न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं को मिला हुआ था।
6. ‘पायक’ कौन थे?
उत्तर:
(i) असम में अहोम राजाओं के अपने पायक होते थे। ये वे लोग थे जिन्हें जमीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी।
(ii) अहोम राजाओं ने जंगलों में हाथी पकड़ने पर अपना एकाधिकार घोषित कर रखा था।
7. मुगलकालीन गाँवों में प्रचलित ‘जजमानी’ व्यवस्था को लिखिए।
उत्तर:
यह व्यवस्था कभी-कभी थोड़े बदले हुए रूप में भी पाई जाती थी, जहाँ दस्तकार और प्रत्येक खेतिहर परिवार परस्पर बातचीत करके अदायगी की किसी एक व्यवस्था पर राजी होते थे। ऐसे में आमतौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था।
उदाहरण के तौर पर, 18वीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में जमींदार अपनी सेवाओं के बदले लोहारों, बढ़इयों और सुनारों तक को रोज का भत्ता और खाने के लिए नकद देते थे। इस व्यवस्था को जजमानी व्यवस्था कहते थे। इससे पता चलता है कि गाँव के छोटे स्तर पर लेन-देन के रिश्ते कितने पेचीदा थे। ऐसा नहीं था कि नकद अदायगी का चलन बिल्कुल ही नदारद था।
8. ‘बटाई प्रणाली’ क्या थी?
उत्तर:
(i) लगान निर्धारण की एक अन्य प्रणाली ‘बँटाई’ या ‘गल्ला बख्शी’ (फ़ारसी) थी। यह मुगल काल की सर्वाधिक प्राचीन प्रचलित प्रणालियों में से एक थी।
इस प्रणाली में किसानों को कर उपज या नकदी, दोनों ही रूपों में देने की छूट होती थी, परंतु सरकार का प्रयास राजस्व को नकद में लेने का रहता था।
कुछ खास फसलें जैसे—
कपास
नील
तिलहन
गन्ना
पर कर नकद ही लिया जाता था। इसलिए इन्हें ‘नकदी खेती’ कहा जाता था।
इस प्रणाली में खेती के बँटवारे के हिसाब से कर लगाया जाता था। तीन प्रकार की बँटाई होती थी—
खेत बटाई
लंक बटाई
रास बटाई
इस प्रणाली का प्रचलन काबुल, कश्मीर एवं ठट्टा में था। मुगल काल में कपास, नील, तिलहन एवं गन्ने को ‘तिजारत फसल’ भी कहा जाता था।
9. ‘कणकुत’ प्रणाली क्या थी?
उत्तर:
अमील-गुजार केवल नकद लेने के आदी नहीं थे, बल्कि फसल भी लेने के लिए तैयार रहते थे। फसल के आधार पर लगान निर्धारित करने के कई तरीके थे।
कणकुत में—
कण का अर्थ है अनाज।
कुत का अर्थ है अनुमान।
यदि उपज के अनुमान में कोई संदेह होता था, तो फसल को तीन अलग-अलग पुलिंदों में काटा जाता था—
अच्छा
मध्यम
बदतर
इस प्रकार उपज का अनुमान लगाकर संदेह दूर किया जाता था। अक्सर अनुमान से किया गया जमीन का आकलन भी पर्याप्त रूप से सही परिणाम देता था।
10. ‘जब्ती प्रणाली’ क्या थी?
उत्तर:
(i) अकबर के शासनकाल के 15वें वर्ष, लगभग 1570–1571 ई. में टोडरमल ने खालसा भूमि पर भू-राजस्व की एक नवीन प्रणाली लागू की, जिसका नाम ‘जब्ती’ था। इस प्रणाली में भूमि की पैमाइश एवं खेतों की वास्तविक पैदावार के आकलन के आधार पर कर की दरें निर्धारित की जाती थीं।
(ii) यह प्रणाली बिहार, लाहौर, इलाहाबाद, मुल्तान, दिल्ली, अवध, मालवा एवं गुजरात में प्रचलित थी।
इसमें कर निर्धारण की दो श्रेणियाँ थीं—
तख़सीस — कर निर्धारण
तहसील — वास्तविक वसूली
लगान निर्धारण के समय राजस्व अधिकारियों द्वारा लिखे गए पत्र को पट्टा, कौल या कौलकरार कहा जाता था।
(iii) इस प्रणाली के अंतर्गत उपज के रूप में निर्धारित भू-राजस्व को नकदी के रूप में वसूल करने के लिए विभिन्न फसलों के क्षेत्रीय आधार पर नकदी भू-राजस्व की अनुसूची (दस्तूर-उल-अमल) तैयार की जाती थी।
(iv) मुगल काल में ‘ख़ुम्स’ नामक कर समाप्त हो गया था, क्योंकि मुगल सैनिक वेतनभोगी होते थे। इस प्रकार उन्हें लूट की संपत्ति का कोई हिस्सा नहीं मिलता था।
मुगल सम्राट को अधीनस्थ राजाओं तथा मनसबदारों द्वारा समय-समय पर दिए जाने वाले एक निश्चित राजस्व को ‘पेशकश’ कहा जाता था।
जब्ती व्यवस्था के लाभ
भूमि की माप को कभी भी जाँचा जा सकता था।
निर्धारित दस्तूरों के कारण पदाधिकारियों की मनमानी नहीं चल सकती थी।
स्थायी दस्तूरों के निर्धारण के बाद भू-राजस्व की अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव में कमी आई।
11. ‘अकबरनामा’ कितनी जिल्दों में रचा गया?
उत्तर : अकबरनामा तीन जिल्दों में रचा गया।
पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया गया।
तीसरी जिल्द ‘आइन-ए-अकबरी’ थी, जिसमें शाही नियम-कानून का सारांश तथा साम्राज्य का विवरण संकलित किया गया था।
12. ‘आइन’ कितने भागों का संकलन है? पहले तीन भागों के नाम लिखिए।
उत्तर:
आइन पाँच भागों का संकलन है, जिसके पहले तीन भाग प्रशासन का विवरण देते हैं।
मंज़िल-आबादी — पहली किताब शाही घर-परिवार और उसके रख-रखाव से संबंधित है।
सिपह-आबादी — सैनिक और नागरिक प्रशासन तथा नौकरियों की व्यवस्था के बारे में है। इसमें शाही अफसरों (मनसबदारों), विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ शामिल हैं।
मुल्क-आबादी — साम्राज्य और प्रांतों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों के आँकड़ों की विस्तृत जानकारी देता है। इसमें “बारह प्रांतों का बयान” तथा प्रशासनिक और वित्तीय इकाइयों—सरकार, परगना और महल—की जानकारी दी गई है।
चौथी और पाँचवीं किताब भारत के लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों से संबंधित हैं।
13. अकबर के समय में राज्य की भूमि की पैमाइश के लिए किस प्रकार का गज प्रयुक्त किया जाता था?
उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर स्रोत में रिक्त है।
14. मुगलकाल में साधारण प्रचलित सिक्के कौन-से थे? उनका भार भी बताइए।
उत्तर:
अकबर ने दिल्ली में एक शाही टकसाल का निर्माण कराया और अब्दुस्समद को उसका प्रधान नियुक्त किया।
अबुल फ़ज़ल के अनुसार—
सोने के सिक्के बनाने के लिए 4 टकसालें थीं।
चाँदी के सिक्कों के लिए 14 टकसालें थीं।
ताँबे के सिक्कों के लिए 42 टकसालें थीं।
अन्य जानकारी:
मुगल काल में टकसाल के अधिकारी को दरोगा कहा जाता था।
जहाँगीर के कुछ सिक्कों पर उसे हाथ में शराब का प्याला लिए हुए दिखाया गया है।
अकबर के कुछ सिक्कों पर राम-सीता की आकृति तथा सूर्य-चंद्रमा की महिमा से संबंधित पद्य मिलते हैं।
औरंगज़ेब ने सिक्कों पर कलमा खुदवाना बंद करा दिया था।
सिक्कों का विस्तृत विवरण अगले पेज (पेज 5) में दिया गया है।
मुगलकालीन प्रचलित सिक्के
1. मुहर —
यह सोने का सिक्का था, जिसे अकबर ने अपने शासनकाल के आरंभ में चलाया था। इसका मूल्य 9 रुपये (आइने-अकबरी के अनुसार) था। यह मुगल काल का सबसे अधिक प्रचलित सिक्का था।
2. शंसब —
अकबर द्वारा चलाया गया सबसे बड़ा सोने का सिक्का, जो 101 तोले का होता था। इसका उपयोग बड़े लेन-देन में किया जाता था।
3. इलाही —
अकबर द्वारा चलाया गया सोने का गोलाकार सिक्का था। इसका मूल्य 10 रुपये के बराबर था।
4. रुपया —
शुद्ध चाँदी का वर्गाकार या चौकोर सिक्का। इसे शेरशाह द्वारा प्रचलित किया गया। इसका वजन 175 ग्रेन था।
5. जलाली —
चाँदी का वर्गाकार या चौकोर सिक्का। इसे अकबर ने चलाया।
6. दाम —
अकबर द्वारा चलाया गया ताँबे का सिक्का, जो रुपये के 40वें भाग के बराबर होता था।
7. जीतल —
ताँबे का सबसे छोटा सिक्का। यह दाम के 25वें भाग के बराबर होता था। इसे फुलूस या पैसा भी कहा जाता था।
8. निसार —
जहाँगीर द्वारा चलाया गया ताँबे का सिक्का, जो रुपये के चौथाई मूल्य के बराबर होता था।
9. आना —
दाम और रुपये के बीच आना नामक सिक्के का प्रचलन करवाया गया।
लघु उत्तरीय प्रश्न (4 अंक वाले)
15. सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के ग्रामीण समाज के क्रियाकलापों की जानकारी किन स्रोतों से प्राप्त होती है? उनका उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(i) सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों के कृषि इतिहास को समझने के लिए मुख्य स्रोत ऐतिहासिक ग्रंथ और दस्तावेज हैं, जो मुगल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे।
सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथों में आइन-ए-अकबरी था, जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने लिखा था। इसमें खेतों की नियमित जुताई, करों की वसूली तथा राज्य और ग्रामीण संभ्रांतों अर्थात जमींदारों के बीच संबंधों के नियमन का लेखा-जोखा दिया गया है।
आइन का मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका प्रस्तुत करना था जहाँ एक मजबूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाए रखता था। किसानों के बारे में आइन से मिलने वाली जानकारी सत्ता के ऊँचे गलियारों के दृष्टिकोण को दर्शाती है।
16. मुगल राज्य किस प्रकार अपने नुमाइंदों जैसे—राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूली करने वाले, हिसाब रखने वाले आदि के द्वारा ग्रामीण समाज पर काबू रखने की कोशिश करता था? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस प्रश्न के अंतर्गत स्रोत में केवल (i), (ii), (iii), (iv) अंकित हैं। विस्तृत उत्तर उपलब्ध नहीं है।
17. मुगलकालीन ग्रामीण समाज जातीय भेदभाव के कारण कई समूहों में विभक्त था। इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
(i) जाति और अन्य जातिगत भेदभाव के कारण खेतिहर किसान कई तरह के समूहों में बँटे थे। खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे या खेतों में मजदूरी करते थे।
(ii) हालाँकि खेती योग्य जमीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को केवल नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इस प्रकार वे गरीब रहने के लिए मजबूर थे। उस समय जनगणना नहीं होती थी, लेकिन उपलब्ध आँकड़ों और तथ्यों से पता चलता है कि गाँव की आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था।
इनके पास संसाधन सबसे कम थे और वे जाति व्यवस्था की पाबंदियों से बँधे थे। उनकी स्थिति आधुनिक भारत में दलितों की स्थिति से मिलती-जुलती थी।
(iii) दूसरे समुदायों में भी ऐसे भेदभाव फैलने लगे थे। मुस्लिम समुदाय में हलालखोरान जैसे “नीच” कामों से जुड़े समूह गाँव की सीमा के बाहर ही रह सकते थे। इसी प्रकार बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ—नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी।
18. मुगलकालीन ग्रामीण पंचायत के अलावा हर जाति को अपनी पंचायत रखने की जरूरत क्यों महसूस होती थी? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
(i) ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। समाज में ये पंचायतें काफी ताकतवर होती थीं। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी झगड़ों का निपटारा करती थीं।
(ii) ये पंचायतें जमीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं। वे यह भी तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं तथा गाँव के आयोजनों में किसे किसके ऊपर तरजीह दी जाएगी और कर्मकांडीय वर्चस्व किस क्रम में होगा।
(iii) फौजदारी न्याय को छोड़कर अधिकांश मामलों में राज्य जाति पंचायत के फैसलों को मानता था।
पश्चिम भारत, विशेषकर राजस्थान और महाराष्ट्र, के दस्तावेजों में ऐसी कई अर्जियाँ मिलती हैं जिनमें पंचायत से ऊँची जातियों या राज्य के अधिकारियों के खिलाफ जबरन कर वसूली या बेगार वसूली की शिकायत की गई है। आमतौर पर ये अर्जियाँ ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे।
(ii) आइन की जानकारी के साथ-साथ उन स्रोतों का भी उपयोग किया जा सकता है जो मुगलों की राजधानी से दूर के इलाकों में लिखे गए थे। इनमें 17वीं और 18वीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान से मिलने वाले दस्तावेज शामिल हैं, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं।
(iii) इसके अलावा, ईस्ट इंडिया कंपनी के अनेक दस्तावेज भी हैं, जो पूर्वी भारत में कृषि संबंधों का उपयोगी विवरण प्रस्तुत करते हैं। ये स्रोत किसानों, जमींदारों और राज्य के बीच तनाव और झगड़ों को दर्ज करते हैं तथा यह समझने में सहायता करते हैं कि किसान राज्य को किस दृष्टि से देखते थे और राज्य से किस प्रकार के न्याय की अपेक्षा रखते थे।
19. मध्यकालीन भारत के समाज में सिंचाई व्यवस्था किस प्रकार एक अभिन्न अंग थी? उत्तर व दक्षिण भारत का तुलनात्मक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(i) मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा कि आज भी है। लेकिन कुछ ऐसी फसलें भी थीं जिनके लिए अतिरिक्त पानी की जरूरत होती थी। इनके लिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़ते थे।
सिंचाई कार्यों को राज्य की मदद भी मिलती थी। उदाहरण के लिए, उत्तर भारत में राज्य ने कई नई नहरें और नाले खुदवाए तथा पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई। शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर इसका उदाहरण है।
(ii) खेती मेहनत का काम था, लेकिन किसान ऐसी तकनीकों का भी इस्तेमाल करते थे जो अक्सर पशुबल पर आधारित होती थीं। इसका एक उदाहरण लकड़ी का हल था, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगाई जाती थी।
ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहराई तक नहीं खोदते थे, जिससे तेज गर्मी के महीनों में मिट्टी में नमी बनी रहती थी।
(iii) बैलों के जोड़े की सहायता से खींचे जाने वाले बरमे का इस्तेमाल बीज बोने के लिए किया जाता था। हालाँकि बीजों को हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज अधिक प्रचलित था।
मिट्टी की गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धारदार औजार इस्तेमाल किए जाते थे।
(iv) बाबरनामा में सिंचाई के उपकरणों का वर्णन मिलता है। बाबर के अनुसार, हिंदुस्तान का अधिकांश भाग मैदानी भूमि पर बसा था। यहाँ शहर और खेती योग्य जमीन बहुतायत में थी।
शरद ऋतु की फसलें वर्षा के पानी से पैदा हो जाती थीं और बसंत ऋतु की फसलें कई बार बिना वर्षा के भी उग जाती थीं।
(v) छोटे पेड़ों तक बाल्टियों या रहट के माध्यम से पानी पहुँचाया जाता था। लाहौर, दीपलपुर और अन्य स्थानों पर रहट के जरिए सिंचाई की जाती थी।
रहट में रस्सियों और घड़ों की सहायता से कुएँ से पानी निकाला जाता था। बैलों की सहायता से पहिया घुमाया जाता था और घड़ों द्वारा निकाला गया पानी नालियों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाता था।
आगरा, चाँदवर और बयाना जैसे क्षेत्रों में लोग बाल्टियों से सिंचाई भी करते थे।
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